Description
स्वयं को जानना अपने बारे में कुछ जानकारी इकट्ठी करना नहीं है; यह उन धारणाओं, भय, इच्छाओं और पहचानों को देखना है जिन्हें हम अब तक अपना ‘मैं’ समझते आए हैं।”
इस किताब को सरल भाषा में आध्यात्मिकता + मनोवैज्ञानिक आत्मचिंतन + व्यावहारिक अभ्यास के रूप में लिखा जा सकता है। हर अध्याय के अंत में “आज का आत्मचिंतन” और 3–5 प्रश्न दिए जा सकते हैं, जिससे पाठक किताब पढ़ने के साथ स्वयं पर काम भी करे।
स्वयं को जानना अपने बारे में कुछ जानकारी इकट्ठी करना नहीं है; यह उन धारणाओं, भय, इच्छाओं और पहचानों को देखना है जिन्हें हम अब तक अपना ‘मैं’ समझते आए हैं।”
Reviews
There are no reviews yet.